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उत्तर प्रदेश की राजनीति
पर अदालत की नसीहतों पर कोई भी राजनीतिक दल अमल करता नहीं दिख रहा है। समाजवादी पार्टी को छोड़ दें तो किसी भी दल ने पूरी तरह से अपराधियों से भी तौबा नहीं की। बसपा ने पूरे समय यही कहा कि उसके राज्य में भयमुक्त शासन रहता है लेकिन मुस्लिमों के साथ सियासी समीकरण बनाने के साथ ही उसने अंसारी बंधुओं से गठजोड़ करके यह जता दिया कि उसके उसूल और नारे कोरे और खोखले हैं। यह उसी तरह भोथरे हैं जिस तरह राजनीतिक दलों की मंशा की लोग उम्मीद रखते हैं। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने सिद्धांतों पर अमल नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो अपनी कार्यकारिणी की बैठक में ही अपने नेताओं को चेतावनी दी थी कि नेता अपने रिश्तेदारों के लिए टिकट न मांगे। लेकिन यह क्या चुनाव के लिये योद्धा उतारे गये तो परिवार वाद की बातें केवल कोरी ही थी। खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे को भी टिकट थमा दिया गया। इसी तरह लालजी टंडन के पुत्र को भी टिकट थमाया गया। यह दो उदाहरण तो केवल बानगी हैं। ऐसे राजनेताओं के पुत्रों और पुत्रियों को टिकट की फेहरिश्त तो बहुत लंबी है। इसकी सफाई घोषणा पत्र पेश करते समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह कहकर दी कि परिवार वाद का मतलब यह होता है कि नरेंद्र मोदी का बेटा राजनीति में आये। यह सिद्धांत विधायकों और सांसदों के पुत्रों व पुत्रियों पर लागू नहीं होता। इसी तरह से इन चुनावो ंने दल-बदलुओं को भी रातों-रात निष्ठा बदलकर खूब फलते-फूलते देखा। तीन-चार महीने पार्टी बदलकर आये नेताओं को मतदाताओं के सिर माथ्ो मढ़ दिया गया। भाजपा में आये ऐसे नेताओं की संख्या सबसे अधिक है। जबकि बसपा दूसरे नंबर पर है। समाजवादी पार्टी ने किसी दूसरे नेताओं को ज्यादा फलने-फूलने का अवसर नहीं दिया या यूं कहंे कि उसकी साइकिल पर किसी दूसरे दल का उम्मीदवार आ नहीं सका। क्योंकि मतदाताओं की मुनादी तक साइकिल ऐसी लहराती चल रही थी कि पता नहीं था कि साइकिल का हैंडिल कौन थामेगा। ऐसे में उसके प्रत्याशी ही दूसरे दलों में ठिकाना ढूंढ़ रहे थ्ो तो उसके साथ कौन आता। शायद इसीलिये समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके अपनी स्थिति को बेहद मजबूत करने की कोशिश की। परंतु बात यहां राजनीतिक शुचिता की है। कोई भी राजनीतिक दल इस समय अपने मतदाताओं व अपनी सोच में विश्वास करने वालों को यह संदेश देने में सफल नहीं हो पा रहा है कि साफ व बेदाग छवि वालों को ही वह अपना टिकट देगा। ऐसे में मतदाताआंे को अब जागरूक होने का समय आ गया है कि वह सिर्फ अपने कमरे में नसीहतें देने के बजाय उस दल के प्रत्याशियों को अपना समर्थन दें जो धर्म और जाति आधारित राजनीति के बजाय विकास परक राजनीति को अपना समर्थन देते हो या फिर बेदाग छवि वालों को अपना उम्मीदवार बनाया हो क्योंकि जब साफ छवि के लोग सदन में जायेंगे तभी समाज की छवि स्वच्छ होगी।

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